कुछ ऐसा काम . . .

चलो कुछ ऐसा काम करते हैं,
के जग में अपना भी कुछ नाम करते हैं।
देखते हैं ख़वाब कुछ नये से,
ख़ुद कौ आज खुद में ही गुमनाम करते हैं।।

उस अधुरी नींद भरी रात से,
पुछते है सवाल कई,
जो हैं अनकहे से, दबे से,
जो हुआ, वो क्यू हुआ, कैसे हुआ,
इन सारे सवालों के जवाब,
ढ़ुढ़ने का कुछ इन्तजाम करते हैं।

चलो कुछ ऐसा काम करते हैं,
के जग में अपना भी कुछ नाम करते हैं।
देखते हैं ख़वाब कुछ नये से,
ख़ुद कौ आज खुद में ही गुमनाम करते हैं।।

कब तक चले ये सिलसिला, पता नहीं।
जाने कौन कहां मिला, पता नहीं।
खुद से ही है क्यू हर गिला, पता नहीं।
क्यू ना मैं खुद से जा मिला, पता नहीं।

“पता नहीं” को “पता नहीं” रहने देने
की हर कोशिश को, आज तो नाकाम करते हैं।

चलो कुछ ऐसा काम करते हैं,
के जग में अपना भी कुछ नाम करते हैं।
देखते हैं ख़वाब कुछ नये से,
ख़ुद कौ आज खुद में ही गुमनाम करते हैं।।

. . . . Rahul.singh

Advertisements